सिस्टम से टकराने का साहस रखने वाला भारतीय शूटिंग का ‘रिबेल विद ए कॉज’ अब कभी दिखाई नहीं देगा, लेकिन खिलाड़ियों के अधिकारों के लिए उठाई गई उसकी आवाज हमेशा सुनाई देती रहेगी
विशेष श्रद्धांजलि लेख: डॉ. राजवीर सिंह, संपादक—भारतीय वाणिज्य
मीडिया इनपुट एवं विश्लेषण: फरीद अली, चीफ प्रोड्यूसर एवं एंकर, टीवी9 भारतवर्ष
भारतीय निशानेबाजी को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाले दिग्गज निशानेबाज, पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित राष्ट्रीय कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन भारतीय खेल जगत के लिए ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। 12 जून को दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके अचानक चले जाने से निशानेबाजों, प्रशिक्षकों, खेल प्रशासकों और प्रशंसकों के बीच शोक की लहर है।
जसपाल राणा को केवल पदक जीतने वाले एक महान खिलाड़ी या नई पीढ़ी को तैयार करने वाले सफल प्रशिक्षक के रूप में याद करना उनकी पूरी शख्सियत का वर्णन नहीं होगा। वह भारतीय शूटिंग की उन चुनिंदा आवाजों में शामिल थे, जिन्होंने उपलब्धियों के साथ-साथ व्यवस्था की खामियों पर भी खुलकर सवाल उठाए। खिलाड़ियों को सुविधाएं दिलाने का विषय हो, चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग हो अथवा सरकारी नीतियों से खेल प्रतिभाओं को होने वाला नुकसान—राणा ने कभी खामोशी को विकल्प नहीं बनाया।
टीवी9 भारतवर्ष के चीफ प्रोड्यूसर एवं एंकर तथा राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज फरीद अली ने अपने विश्लेषण में जसपाल राणा को भारतीय शूटिंग का ऐसा ‘रिबेल विद ए कॉज’ बताया, जिसने विरोध केवल चर्चा में आने के लिए नहीं, बल्कि खिलाड़ियों और खेल के हित में किया। फरीद अली के मुताबिक, राणा की सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वह किसी मुद्दे पर निर्णय लेने के बाद उसके व्यक्तिगत परिणामों की चिंता नहीं करते थे। उनके सामने लक्ष्य स्पष्ट होता था—भारतीय निशानेबाज को उसका अधिकार, सम्मान और विश्वस्तरीय सुविधा मिलनी चाहिए। टीवी9 पर प्रकाशित मूल विश्लेषण भी फरीद अली ने लिखा था।
पिता और करीबियों के लिए हमेशा ‘फाइटर’ रहे
उत्तराखंड सरकार के पूर्व मंत्री और जसपाल राणा के पिता नारायण सिंह राणा सहित उनके कई करीबी उन्हें गर्व से ‘फाइटर’ कहा करते थे। इसका कारण उनका बेबाक स्वभाव था। जिस बात को वह खिलाड़ियों या देशहित में गलत मानते, उसका विरोध करने से पीछे नहीं हटते थे। सामने कोई खेल संस्था हो, शक्तिशाली अधिकारी हो अथवा सरकार की कोई नीति—उनकी आवाज का स्वर कभी कमजोर नहीं पड़ता था।
उनका संघर्ष निजी लाभ, पद अथवा प्रसिद्धि के लिए नहीं था। वह जानते थे कि व्यवस्था पर प्रश्न उठाने से उनका पद, जिम्मेदारी या अवसर प्रभावित हो सकता है, फिर भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यही साहस उन्हें एक सामान्य खिलाड़ी से अलग करता था। वह मैदान में प्रतिद्वंद्वी से और मैदान के बाहर खिलाड़ियों को कमजोर करने वाली व्यवस्था से लड़ते रहे।
कॉमनवेल्थ गेम्स से शूटिंग हटने पर मुखर विरोध
साल 2022 के कॉमनवेल्थ गेम्स से शूटिंग स्पर्धाओं को बाहर किए जाने के फैसले ने भारतीय निशानेबाजी जगत को गहरा आघात पहुंचाया था। जसपाल राणा उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने इस फैसले के विरोध में बेहद कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने भारतीय निशानेबाजों और नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया से ब्रिटेन में निर्मित शूटिंग उपकरणों के बहिष्कार की अपील की थी।
उनका मानना था कि केवल बयान देने से अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाओं पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। भारत को अपनी आर्थिक और खेल शक्ति का अहसास कराना होगा। उनकी यह अपील कठोर अवश्य थी, लेकिन इसके पीछे भारतीय निशानेबाजी के सम्मान और भविष्य की चिंता थी।
बार-बार बदलती चयन नीतियों पर उठाए सवाल
जसपाल राणा ने ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए अपनाई जाने वाली चयन नीतियों में लगातार होने वाले बदलावों का भी विरोध किया। उनका कहना था कि यदि किसी खिलाड़ी को लंबे समय से एक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तैयारी कराई जा रही है और अंतिम समय में ट्रायल या चयन के नियम बदल दिए जाएं, तो उसकी वर्षों की मेहनत प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि खराब फॉर्म से गुजर रहे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को व्यवस्था कितनी सहायता देती है। सौरभ चौधरी और जीतू राय जैसे नामी निशानेबाजों के कठिन दौर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा था कि किसी खिलाड़ी को केवल पदक जीतने तक महत्व देना पर्याप्त नहीं है। असफलता या खराब फॉर्म के दौरान उसे तकनीकी, मानसिक और संस्थागत सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
राणा का स्पष्ट मत था कि खिलाड़ी कोई मशीन नहीं है, जिससे हर प्रतियोगिता में पदक की उम्मीद की जाए। उसकी मानसिक स्थिति, अभ्यास, उपकरण, पारिवारिक परिस्थितियों और प्रदर्शन में आने वाले उतार-चढ़ाव को समझना भी खेल प्रणाली की जिम्मेदारी है।
महंगे उपकरणों पर जीएसटी के खिलाफ चलाया अभियान
वर्ष 2017 में आयातित शूटिंग उपकरणों पर 28 प्रतिशत तक जीएसटी लगाए जाने के बाद जसपाल राणा ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया। शूटिंग पहले से ही महंगा खेल है। पिस्तौल, राइफल, कारतूस, विशेष कपड़े और अन्य तकनीकी उपकरणों की कीमत सामान्य परिवारों की पहुंच से बाहर होती है। अधिक टैक्स लगने से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए इस खेल में आगे बढ़ना और कठिन हो सकता था।
दिल्ली स्टेट राइफल एसोसिएशन के चेयरमैन के रूप में राणा ने इस मुद्दे पर व्यापक अभियान चलाया। उन्होंने नीति-निर्माताओं तक यह बात पहुंचाने की कोशिश की कि शूटिंग उपकरण विलासिता का सामान नहीं, बल्कि खिलाड़ियों के लिए आवश्यक खेल सामग्री हैं। उन पर अत्यधिक कर लगाना भारत के ओलंपिक सपनों को महंगा और कमजोर बनाने जैसा है।
यह अभियान उनकी दूरदृष्टि का उदाहरण था। वह केवल शीर्ष खिलाड़ियों की चिंता नहीं कर रहे थे, बल्कि उन बच्चों की आवाज बन रहे थे जिनमें प्रतिभा तो थी, लेकिन महंगे उपकरण खरीदने के साधन नहीं थे।
कामचलाऊ सुविधाओं के खिलाफ विश्वस्तरीय व्यवस्था की मांग
राणा ने भारतीय खेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी कई बार गंभीर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि जब भारतीय खिलाड़ी विश्वस्तरीय प्रतियोगिता में उतरते हैं, तो उनसे विश्वस्तरीय प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है। ऐसी स्थिति में उन्हें प्रशिक्षण और तैयारी के दौरान भी उसी स्तर की सुविधाएं मिलनी चाहिए।
उन्होंने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली कुछ सुविधाओं में सुधार की मांग की। फिजियोथेरेपिस्ट, चिकित्सक, तकनीकी विशेषज्ञ और आर्मरर जैसे सहयोगी स्टाफ की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। शूटिंग एक अत्यंत तकनीकी खेल है, जिसमें हथियार का छोटा-सा तकनीकी दोष या खिलाड़ी की शारीरिक स्थिति में मामूली बदलाव भी प्रदर्शन प्रभावित कर सकता है।
उनका मानना था कि विदेशी खिलाड़ी आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बेहतर मेडिकल सपोर्ट और गुणवत्तापूर्ण उपकरणों के सहारे मैदान में उतरते हैं। इसके विपरीत भारतीय निशानेबाज कई बार अपनी प्राकृतिक प्रतिभा, सीमित साधनों और अथक मेहनत के बल पर अपेक्षा से अधिक सफलता हासिल करते हैं।
राणा को इस बात से भी आपत्ति थी कि खिलाड़ियों या प्रशिक्षकों की जरूरी मांगें सरकारी फाइलों और प्रशासनिक मंजूरियों में महीनों तक अटकी रहती हैं। उनका कहना था कि ओलंपिक की तैयारी सामान्य सरकारी कामकाज की गति से नहीं हो सकती। खिलाड़ी का प्रशिक्षण कैलेंडर इंतजार नहीं करता, इसलिए आवश्यक उपकरण और सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
पदक जीतने वालों के साथ उभरती प्रतिभाओं की भी चिंता
जूनियर राष्ट्रीय कोच के रूप में जसपाल राणा ने भारतीय शूटिंग को अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी दिए। उन्होंने देखा था कि कॉरपोरेट संस्थाएं, प्रायोजक और मीडिया प्रायः उन्हीं खिलाड़ियों के पीछे खड़े होते हैं, जो ओलंपिक कोटा हासिल कर चुके हों या कोई बड़ा पदक जीत चुके हों।
लेकिन किसी खिलाड़ी को उस स्तर तक पहुंचाने के लिए वर्षों की मेहनत, अभ्यास और आर्थिक सहायता की जरूरत होती है। इसीलिए राणा लगातार उन इंटरमीडिएट, बैक-बेंचर और ग्रासरूट निशानेबाजों के लिए आवाज उठाते रहे, जिनके पास प्रतिभा और मेहनत तो थी, लेकिन पहचान एवं संसाधनों का अभाव था।
वह मानते थे कि भारत को स्थायी खेल शक्ति बनना है तो केवल कुछ सितारा खिलाड़ियों पर निर्भर रहने की मानसिकता छोड़नी होगी। गांव, छोटे शहर, स्कूल, कॉलेज और जिला स्तर पर शूटिंग की मजबूत व्यवस्था तैयार करनी होगी। प्रतिभाओं को शुरुआती दौर से उपकरण, प्रशिक्षक, प्रतियोगिताएं और वित्तीय सहयोग मिलेगा, तभी भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय चैंपियन पैदा कर सकेगा।
कोच और खिलाड़ी की स्वायत्तता के लिए संघर्ष
जसपाल राणा का खेल संगठनों के साथ कई बार मतभेद भी हुआ। उनका सिद्धांत था कि टीम चुने जाने के बाद खिलाड़ी और प्रशिक्षक को तैयारी की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। हर खिलाड़ी की तकनीक, मानसिकता और आवश्यकता अलग होती है। इसलिए बाहर बैठकर कोई अधिकारी एक ही ट्रेनिंग कैलेंडर या प्रक्रिया सभी खिलाड़ियों पर लागू नहीं कर सकता।
उन्होंने प्रशिक्षण प्रक्रिया में अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप का विरोध किया। इसी अडिग रुख के कारण उन्हें कभी-कभी मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और अस्थायी रूप से प्रशिक्षण शिविर से बाहर भी रहना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सोच नहीं बदली।
राणा के लिए कोचिंग केवल निर्देश देने का काम नहीं था। वह खिलाड़ी के मन, दबाव और परिस्थितियों को समझने में विश्वास रखते थे। मनु भाकर सहित कई प्रतिभाशाली निशानेबाजों की सफलता में उनके मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने जूनियर कार्यक्रम के माध्यम से सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे खिलाड़ियों को निखारने में भी योगदान दिया।
अस्पताल में 11 दिनों तक चला संघर्ष
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, म्यूनिख में आयोजित आईएसएसएफ विश्व कप से भारतीय दल के साथ लौटते समय जसपाल राणा की तबीयत विमान में बिगड़ी थी। दिल्ली पहुंचने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकीय जांच के बाद स्टेंट लगाया गया। शुरुआती उपचार के बाद उनकी स्थिति स्थिर बताई गई थी, लेकिन बाद में हृदय से जुड़ी गंभीर जटिलता उत्पन्न हुई और उन्हें बचाया नहीं जा सका।
उनका जाना इसलिए भी अधिक पीड़ादायक है, क्योंकि भारतीय शूटिंग को अभी उनके अनुभव, नेतृत्व और बेबाक आवाज की जरूरत थी। उन्होंने खिलाड़ी के रूप में देश को सम्मान दिलाया, प्रशिक्षक के रूप में नई पीढ़ी तैयार की और खेल प्रशासक के रूप में व्यवस्था में सुधार की लड़ाई लड़ी।
पदक गिने जा सकते हैं, लेकिन साहस की विरासत नहीं
जसपाल राणा के पदक, पुरस्कार और रिकॉर्ड खेल इतिहास की पुस्तकों में दर्ज रहेंगे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत वह साहस है, जिसके साथ उन्होंने शक्तिशाली व्यवस्था के सामने खिलाड़ियों का पक्ष रखा। वह जानते थे कि सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ सकती है, फिर भी कभी पीछे नहीं हटे।
उनका जीवन हमें बताता है कि महान खिलाड़ी केवल वह नहीं होता, जो अपने लिए पदक जीते। सच्चा महान खिलाड़ी वह भी होता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता आसान करे, कमजोर प्रतिभाओं की आवाज बने और व्यवस्था को उसकी कमियों का आईना दिखाए।
आज भारतीय शूटिंग ने अपना एक महान चैंपियन, संवेदनशील गुरु और निडर प्रहरी खो दिया है। उनके जाने से शूटिंग रेंज में केवल एक स्थान खाली नहीं हुआ, बल्कि खिलाड़ियों के अधिकारों के लिए गरजने वाली एक बुलंद आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई।
जसपाल राणा निशानेबाज थे, प्रशिक्षक थे, मार्गदर्शक थे—लेकिन इन सबसे बढ़कर वह एक फाइटर थे। उनका निशाना केवल मेडल पर नहीं, भारतीय शूटिंग की कमजोरियों पर भी था।
भारतीय वाणिज्य परिवार की ओर से महान निशानेबाज एवं राष्ट्रीय कोच जसपाल राणा को भावभीनी श्रद्धांजलि।
अलविदा ‘गोल्डन बॉय’—आपकी उपलब्धियां देश का गौरव और आपका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बना रहेगा।